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हिंदी दिवस के अवसर पर…On Hindi Day

कभी कभी जब मन कुछ विचलित सा होता है तो व्यक्ति कई उपाय खोजता है मन को स्थिर करने के लिए। ऐसा ही एक उपाय खोजते खोजते आज मैं अपने इस ब्लॉग पर एक वर्ष पूर्व की आज ही के दिन, अर्थात हिंदी दिवस के दिन की, प्रस्तुति तक पहुँच गई। उसे पढ़ा, उसके मूल सार पर, मुख्य भाव पर कुछ पल मनन किया और मन एक नई स्फूर्ति की ओर जाने के लिए कुछ और अधिक तैयार होता सा प्रतीत होने लगा। 

सोचा क्यों न उसी प्रस्तितु को दोबारा से पाठकों के समक्ष रखा जाये। और तभी श्री अरविन्द की अंग्रेजी में लिखी यह पंक्तियां याद आई :

Language is the sign of the cultural life of a people, the index of its soul in thought and mind that stands behind and enriches its soul in action.…Diversity of languages is worth keeping because diversity of cultures and differentiation of soul-groups are worth keeping and because without that diversity life cannot have full play; for in its absence there is a danger, almost an inevitability of decline and stagnation. (Sri Aurobindo, CWSA, vol 25, p. 519)

इस भाव के अनुवाद का एक प्रयास यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ —

“भाषा एक जनसाधारण के सांस्कृतिक जीवन का संकेत है, उसके सामूहिक विचार और मन की आत्मा की पहचान है, उसके सामूहिक कार्य की अभिव्यक्ति एवं सामर्थ्य है ।… भाषाओं की विविधता की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि संस्कृतियों और आत्म-समूहों की विविधता रखने लायक हैं; क्योंकि  विविधता के बिना जीवन की  पूर्ण क्रीड़ा  संभव नहीं है; और इसके अभाव में जीवन के ठहराव और पतन का होना लगभग अवश्यभावी या अटल ही है।” (श्री अरविन्द)

चलिए अब चलते हैं उस प्रस्तुति की ओर जिसमें अनुवाद की कुछ और बात की गई है। 

धन्यवाद 


 

remembering

 

संगीत जब उपासना की ओर ले जाए…कल सुबह के कुछ पल ऐसे ही थे…

एक दिव्य अनुभूति थी जब गुरु नानक के भक्ति-भाव से भरे शब्द पंडित जसराज के भावपूर्ण सुरों में और डॉ एल सुब्रमण्यम के मनमोहक वॉयलिन की तारों पर नाच रहे थे। इस प्रेमपूर्ण संगीत-उपासना में साथ दे रही थीं – कविता कृष्णमूर्ती। और इस संगम में डुबकी लगाने का आनंद-अनुभव शायद शब्दों में वर्णननीय नहीं है।

प्रातः-काल की उस बेला में इस प्रकार का अनुभव वास्तव में ही एक उपासना से कम नहीं है।

 

 

इसे अनुभव करने के बाद यदि आप आगे पढ़ना चाहें तो…. 

आज हिंदी दिवस के अवसर पर रह रह कर वही गुरु नानक की पंक्त्तियां याद आ रही हैं। शायद कल के उस अनुभव की छाप है। परन्तु अपने हिंदी न जानने वाले पाठकों के लिए मैं जब इन पंक्त्तियों का अंग्रेजी में अनुवाद करने का सोचती हूँ तो ऐसा लगता है मानो अनुवाद करने से इस भजन के आतंरिक सत्य को, सम्पूर्ण स्वरूप को मेरा प्रयास कभी पकड़ ही नहीं पायेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ भाव ऐसे होते हैं जो केवल किसी एक भाषा में ही व्यक्त किए जा सकते हैं।

गुरु नानक के ये शब्द साधारण नहीं हैं। ये एक सच्चे भक्तिलीन हृदय की अभिव्यक्ति हैं जो संपूर्ण मानव-कल्याण के लिए हैं, परन्तु इसे और किसी भाषा में कह सकना इतना आसान नहीं है। कम-से-कम मेरे लिए तो नहीं। इसलिए नहीं की अंग्रेजी में उपयुक्त शब्द नहीं है इस बात को कहने के लिए। पर शब्दों का सही चयन सही भाव भी उत्पन कर सके – ऐसा सदैव आव्यशक भी तो नहीं।

एक और कारण भी है जो अनुवाद में कठिनाई प्रस्तुत करता है। वह है – सांस्कृतिक प्रसंग जिसमें इन पंक्तियों का गूढ़ भावार्थ समझा जा सकता है । क्या “मंदिर दीप बिना ” के सही भाव को अंग्रेजी का वाक्यांश “temple without a lamp” वास्तव में अभिव्यक्त कर सकता है ? मंदिर और मंदिर में दीप जलाने के भाव के सांस्कृतिक प्रसंग एवं आतंरिक अर्थ को समझे बिना मात्र अनुवाद कर देने से हम कई बार एक कोमल और पवित्र भाव को, एक आध्यात्मिक कर्म को केवल एक साधारण भावना अथवा एक बाहरी कार्य बना देते हैं।

जब गुरु नानक मंदिर में दीप जलाने की बात करते हैं तो हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार वे हमें स्मरण करवा रहें हैं कि मंदिर केवल बाहर ही नहीं है, वास्तविक मंदिर तो मन के अंदर है। और वह मन-मंदिर हरि नाम के बिना सूना है। बहरी दीप जलाना तो केवल एक बाहरी कार्य है, उसका वास्तविक उद्देश्य तो मन-मंदिर को ज्योतिर्मय करना है।

इसी प्रकार “देह नैन बिन” के भाव को समझने के लिए यह प्रसंग समझना आवश्यक हो जाता है कि यहाँ पर केवल बाहरी नेत्रों या बाहरी दृष्टि की ही बात नहीं हो रही है। बिना आतंरिक दृष्टि के, बिना सूक्ष्म दृष्टि के यह मानव जन्म सूना है, अधूरा है — यह गूढ़ सत्य हम तभी सराह सकते हैं जब हम भारतीय सांस्कृतिक प्रसंग में इस पंक्त्ति को आत्मसात करें। इन सब को मैं अनुवाद में कैसे लाऊँ ?

और सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है — जब एक प्रबुद्ध संत-पीर, एक ऋषि जिसने अपने एवं समस्त ब्रह्माण्ड के आत्म-दर्शन किये हों और इस जगत के सत्य-स्वरूप को पहचाना हो, जब वह हरि-स्मरण की बात करता है तो उस उपदेश की व्याख्या आप एक साधारण वाक्यांश – “Remember the Lord” से कदापि नहीं कर सकते हैं। प्रभु और प्रभु-लीला का स्मरण तो अन्य कई लोग भी करते हैं, पर गुरु नानक शायद हमें उस स्मरण की ओर ले जाना चाहते हैं जो वास्तवतिक रूप में हमें हरि-दर्शन के लिए, एक अंतर-ज्योति से साक्षात्कार के लिए तैयार कर सकता है। इस भाव को अनुवादित कैसे किया जाये ?

इन सब सीमाओं को भली-भांति अपने समक्ष रखते हुए मैं अनुवाद करने का प्रयत्न नहीं कर रही हूँ। इच्छुक पाठक इस लिंक पर एक अनुवादित प्रयास पढ़ सकते हैं। अथवा भाव को बिना शब्दों के ही अनुभव करने के लिए भजन को सुन कर हरी-स्मरण में डूबने का प्रयास कर सकते हैं। जैसा जिसको साजे….

सुमिरन कर ले मेरे मना तेरी बीती जाती उमर हरी नाम बिना रे ||

कूप नीर बिन धेनु क्षीर बिन धरती मेघ बिना |

जैसे तरुवर फल बिन हीना तैसे प्राणी हरी नाम बिना रे ||

देह नैन बिन रैन चन्द्र बिन मंदिर दीप बिना |

जैसे पंडित वेद विहीना तैसे प्राणी हरी नाम बिना रे ||

काम क्रोध मद लोभ निवारो छाड़ दे अब संत जना |

कह नानक तू सुन भगवंता या जग में नहीं कोई अपना ||

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21 thoughts on “हिंदी दिवस के अवसर पर…On Hindi Day

  1. Those were beautiful words by Guru Nanak. Enjoyed reading Hindi after a while. Today is a holiday here else normally there is some activity in the kids’ school on Hindi Diwas.

  2. Loved your post evnthough I don’t know Hindi. Afterall, …. Language is the index of its soul in thought and mind that stands behind and enriches its soul in action…… Liked the music and photo very much.

    1. Thank you, Vasantha. I very much appreciate your stopping by for this post, even though it is in Hindi. The main point I make here is that it is often difficult to translate the essence of a mystic or spiritual poem without fully appreciating the cultural context in which the original expression took form.
      Glad you enjoyed the music and picture! Thanks again 🙂

  3. Beautiful post Beloo. Loved reading the chaste hindi and us mein vkakt kiye gaye vichaar. Guru Nanak dev’s lines, you are so right there, some things are best left in their original forrm.

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